तेज़ तूफ़ान वाली रात थी और मुझे होटल के कमरे में ही रुकना पड़ा। सुबह जल्दी फ्लाइट थी, इसलिए तूफ़ान के थमने का इंतज़ार कर रहा था ताकि हाईवे ढाबे से कुछ खा सकूँ। तभी अचानक दरवाज़े पर दस्तक हुई। खोला तो बाहर कोई नहीं। कुछ देर बाद फिर दस्तक—इस बार खिड़की पर। बारिश के पानी के बीच बस किसी उँगली की झलक दिखी, इंसान साफ़ नहीं दिख रहा था। अचानक बारिश रुक गई। मैं रेनकोट पहनकर बाहर निकला तो हॉलवे में खून की बूँदें दिखीं, जैसे किसी का अंग तेज़ हथियार से कट गया हो। फ्रंट डेस्क पर एक लड़की दर्द में थी, पैरामेडिक उसे देख रहा था। मैं घबराकर गाड़ी की ओर भागा, लेकिन रिवर्स करते समय कुछ फँसा हुआ लगा। बाहर निकला तो ज़मीन पर खून से सनी एक टूटी हुई पैर की उँगली पड़ी थी। डर के मारे मैं अंदर भागा—लेकिन फ्रंट डेस्क खाली थी। तभी लाइट चली गई। अँधेरे में कुछ दरवाज़े से अंदर आया और मेरी पैर की उँगली के पास आकर हल्के से थपथपाने लगा, जैसे मुझे बुला रहा हो। मैं पसीने से भीग गया, हिल भी नहीं पाया। अचानक लाइट आ गई। फ्रंट डेस्क वाली लड़की लौटी और बोली—यह कमरा छोड़ दीजिए, यहाँ ठहरने वालों को या तो सुबह पैर की उँगली...
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