हमारा परिवार शहर के बाहरी इलाके में एक छोटे कस्बे के पास बने सरकारी घर में रहने आया। पिताजी सरकारी डॉक्टर थे, इसलिए घर अधिकारियों द्वारा तय किया गया था, लेकिन हमेशा की तरह साफ-सुथरा और सजा हुआ मिला। मैं और मेरा भाई बच्चों की तरह हर कमरे और बड़े से पिछवाड़े की खोजबीन करने लगे। रात होते ही मेरी नज़र खिड़की के बाहर आँगन में रखी एक पुरानी, धूल और जालों से ढकी कुर्सी पर पड़ी—वह किसी पुराने ज़माने की लग रही थी। आधी रात को प्यास लगी तो पानी लेने उठा, तभी खिड़की की ओर देखा—ऐसा लगा जैसे उस कुर्सी पर कोई बैठा हो। थका हुआ समझकर मैंने इसे सपना मान लिया। अगले दिन पिताजी से पूछा तो उन्होंने कहा कि वे जल्दी सो गए थे, कोई आया ही नहीं। अगली रात मैंने भाई को अपने साथ सुलाने की कोशिश की, पर वह गहरी नींद में था। फिर वही दृश्य—कुर्सी पर कोई बैठा था। हिम्मत जुटाकर मैं परदे के पीछे छिपकर पास गया। बाहर अंधेरा और हल्का कोहरा था, फिर भी वह आकृति स्थिर बैठी दिख रही थी। डरते हुए मैंने दरवाज़ा खोला, हाथ में बैट था, और लाइट जलाई—“कौन हो तुम?” चीख पड़ा। वहाँ कोई नहीं था, सिर्फ़ खाली कुर्सी। लेकिन इस बार कुर्सी ...
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