मेरी शादी का दिन था।
जिस इंसान के साथ पूरी ज़िंदगी बितानी थी, उससे आज मेरा विवाह होने वाला था। मैं खुश था… या शायद होना चाहिए था। मुझे अंदाज़ा नहीं था कि वह रात मेरे लिए क्या लेकर आएगी—जब तक मैंने उसे नहीं देखा।
वह जानी-पहचानी लगी। बहुत ज़्यादा।
पर क्या अब बहुत देर हो चुकी थी?
अजीब बात यह थी कि मैं उसे देख रहा था, लेकिन कोई और नहीं। दोस्तों ने कहा—घबराहट है, शादी कर लो, दिमाग़ खेल कर रहा है। तभी वह एक पल में मेरे और क़रीब आ गई। उसने मेरी आँखों में देखा और कहा—
“तुम ऐसा नहीं कर सकते।”
वह दो साल पहले मर चुकी थी।
लेकिन वह मुझमें ही रहती है—यह सोच डरावनी थी।
अचानक मुझे उसका अंतिम संस्कार याद आया।
भीड़, आग, आँसू…
और वही पल, जब उसने मेरा हाथ थामकर वादा किया था—
“मैं तुम्हें कभी छोड़कर नहीं जाऊँगी।”

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